आब नै रोकु नै टोकु , बाज दिय हमरा
बर्षो दबल बात कहलेल, खोल दिय कमरा
आब नै रुकब, नै झुकब, नै सहब नारि के अपमान
माँ बाप के दुलार अईछ तागत हमर, नै झुकायब अभिमान


बिवाह होइत अप्पन छोडलौं , हृदय पत्थर केलौं
माँ बाप के मान सम्मान लेल , सबटा धर्म निभेलौं
हम मौन छि , सहैत छि त् बुझ्नुक नै छि
बाजब त कहब जे , हम संस्कारी नै छि


नारी नारी के जन्म दैत छैथ , सम्मान मे किया कमि
दर्द, अपमान , तिरस्कार सहैत बोलि मे किया नमि
माँ बाप के दुलार अईछ तागत हमर , नै झुकायब मान सम्मान
सहैत सम्मान करै छि , बुझु ई बात , नै करु अपमान

पुतौह सेहो नारी छैथ , बेटी के दर्जा नै चाही
नारी, नारी के मनके भाव बुइझ लिय , ई परिवर्तन चाही
निस्वार्थ प्रेम ,भाव स व्यबहार लिय दिय
साउस पुतौह , नारी शक्ति बनु , सुन्दर सुअवसर लिय


निसन्देह , गर्भे स, बदमासी नै छै क्यो सिखैत
परिस्थिती आ बातावरण जिम्मेबार अईछ देखबईत
प्रणकरु , सब अपन उमेर समुहमे , परिवर्तन लायब
जे जत् , पद धारण केने छि , कुशलता पूर्वक निभायब


परम्परागत प्रबिधि त्यागी , जेना नव प्रबिधि अपनबै छि
सोच परम्परागत त्यागी , नव परिवर्तनकारी कियाक नै बनैत् छि
आब नै रोकु, नै टोकु बाज दिय हमरा
वर्षो दबल बात, कह लेल खोल दिय कमरा |||


रचियता : ज्योति कुमारी झा ( समाजशास्त्री )