ये जो भीड़ घेर कर मारती है न! चप्पल-जूते, लात-घूंसे, लाठी-बल्लम! ये सब कायर होते हैं, अपने बच्चों को सिर्फ एक बात सिखाइएगा कि भीड़ से दूर रहना ग़म और अत्यधिक खुशी दोनों मामलों में….किसी के पिटने का एक वाकया इन टेंश दिनों में बार-बार मेरे दिमाग में आता है, मैं आज भी सोचती हूँ क्या सोचता होगा वो उस लड़की के बारे में जिसके कारण, लिए नहीं! उसने मार खायी थी।

 मैं नहीं हूँ, मैं  अपने मामले खुद हैंडल करती थी  वो थी कोई अपने नजदीक की लड़की, जान-पहचान वाली, जिसमें उसका भी कोई कुसूर नहीं था, वो तो बहुत बाद में जान पायी कि वो लड़का जो अब स्कूल नहीं आता, उसकी और कुछ अपने कारणों से गायब है! कुछ बीसेक साल हुए हैं इस हादसे को जब एक दिन उस शांत, सरल लड़की के बड़े भाई को पता चला कि उसके साथ 9 में पढ़नेवाला लास्ट बैंचवाला एक गवंई लड़का ये कहता फिर रहा है कि उस लड़की से उसका चक्कर है और लड़की के अपने हाथों से लिखे प्रेम पत्र उस लड़के के पास हैं। 

  छोटी बहनों के बड़े भाई 90/95 तक बड़ी ऐंठ में रहते थे, छुटकियों से दो-चार साल बड़े होते थे और रुआब ये होता था कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तान हैं। हमाए कहानी वाले राजाबाबू को भी यही बीमारी थी, उनको भी लगता था दो-चार लौंडों का दादा प्रणाम/ भैया सलाम कह देने का मतलब कमांडर जनरल वाली जिम्मेदारी है, तो जब उन्हें ये खबर मिली तो उनके हाथों और दिमाग की खुजली बढ़ गयी, अगर थोड़ा भी दिमाग होता तो समझा-बुझाकर भेज देते मगर अभी तो मौका मिला था, नाम करने का बस! प्लानिग हुई और उसके एक दोस्त को जो राजाबाबू के गैंग का परमानेंट मैबंर था, ये जिम्मेदारी दी गयी कि उस मजनूँ को एक खाली सरकारी गोदाम में लाना है, बांकी हम देख लेंगे।

वो बुरा दिन भी आया जब उस लड़के ने अपनी जिंदगी में कभी भी न भूलनेवाले सबक सीखा….बहुत मार खायी बेचारे ने और खूब माफियां मांगी! सोचिये क्या बीत रही होगी उस 14/15 साल के लड़के पर जब उसे ऐसे घेरकर पीटा गया था, वो भी उन लोगों के द्वारा जिनसे वो रोज हाथ मिलाता था, दुआ-सलाम करता था…. अपनों से पिट जाना, कभी भी न भूलनेवाला अनुभव होता है। उस हादसे के बाद उसने वो जगह छोड़ दी और कई सालों तक वहां नजर नहीं आया….मगर उसकी पिटाई के गवाह और मुख्य पिटाईकर्ताओं ने अपने उस गुनाह की बहुत बड़े-बड़े हिसाब चुकाये, सबने अपने-अपने घर में एक ऐसे इंसान को खोया जिनसे वो बेहद प्यार करते थे वो भी बहुत कम उम्र में……और एक ने तो अपना जीवन भी।

लेखक :- श्रीमती रुशा रुचि राणा
(वहाँ लेखक, स्वतन्त्र राजनीतिक विश्लेषक, महिला अधिकारकर्मी हुनुहुन्छ ।)