मिथिला नगरीमे भरहल शोर
दहेज नै लेब सबके जोर
टेढ आँंगुर सँ निकालैत घि देखु
रूप परिवर्तन दहेजके बुझु

वरके बाबु कहैछैथ नै चाहि टका
भारउठालिय , पच्चीसभइर सोन आ बस्त्र सबटा
ध्यान नै दिय छाता आ जुत्ता
धियाके छोटे छिन दिय चाईरचक्का
नैहर जँ एति , शोभत अहिँके दरबज्जा
मनोरथ एतबे पुरादिय
दहेज नै , अपन धियाके सबकिछ दिय

समतुल्य योग्य बनाक धियाके पठायब
सोचलौं समाज सँ दहेज प्रथा हटायब
दहेजके रूप परिवर्तन भगेल
नगदि छोइड सामानके जामाना भेल

धिया पढल ,योग्यके दहेज नैलेब सुनलौं
घुमाफिराक सबकिछ लैइत देखलौं
अडाक माँगैछैत त तिलक गैइन दैइतौं
लोहछैत मन बाजैत कनियागतके देखलौं

देखलौं किछ कनियागत जे तिरस्कार करैइत
आभाषभेल ,धियाके उमेर बढैत
सोचमे कनियागत ,धियाके बिवाहलेल
दहेज प्रथा चरम सिमापर गेल ।।

जय मिथिला जय माता जानकी जी
रचयिता : ज्योति झा