मनसुनमे आनन्दित महलबासी
दुखिया छाति पिटरहल बनल उदासी
दहायल बारी, खेतक आईर
सबबेर कहैत देखु बडका बाढि
छटपटाक करैय उबेरक आश
आफत जँ परल ,अपनलोक निराश

मुठिये खाय दबेलक पेट
मनसुन बनल भारी कलेश
राहत सँ जीवन कोना चलत
अपन सम्पत्ति जँ गेल दहाय
जैंहतैंह देखारहल अछि सागर
धियापुताके छाँक पर मन टाँगल
ठिठुरैत तन जाढ मास सन
सुखायब कपरा ,तब झाँपब तन

खेत खलिहान आ दरबज्जा
कतो नै किछ जोगार
मालजाल आ टाल पूवार
सब अछि हालबेहाल
ताइकरहल उबेरक पहर
दैव सँ मागैत हटाब कहर
मनसुनमे हर्षित होब सोचलौं
एहन प्रलय कतहुनै देखलौं

सपना छल खेतमे नचितौं
टोलसमाज सँग मधुमास मनबितौं
नै जानि कहाँ सँ बाढि हहायल
सपना सबटा धारमे दहायल ।।

जय माता जानकी जी जय मिथिला
रचियता : ज्योति झा